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Tuesday, February 15, 2011

आम सरोकारों से दूर होती पत्रकारिता रवि शंकर मौर्य

पत्रकारिता के माएने बदल चुके है,ये बात अक्सर सुनने को मिलती है।जब कभी पत्रकारिता के महारथियों से आज की पत्रकारिता के विषय में पूछा जाता है।तो उनका यही जबाब होता है,कि पत्रकारिता में विज्ञापन,पैसे,बाजार का महत्व बढा है।किन्तु पत्रकारिता आज भी आम सरोकारों को लेकर चलती है।लेकिन सवाल ये है, कि क्या आज पत्रकारिता के माएने बदल चुके है?क्या वाकई पत्रकारिता के मूल्यों मे बदलाव हुआ है? नही साहब पत्रकारिता आज भी जन सरोकारों के साथ है। पत्रकरिता के ना तो मानक बदले है।और ना ही बदलेगें क्योंकि अगर पत्रकारिता के मानक बदल गए तो फिर वो पत्रकारिता नही रह जाएगी।ऐसा ज्यादातर मीडिया मठाधीष कहते मिलेगें,लेकिन सच्चाई इसके विपरीत है।पत्रकारिता में बाजारबाद बढा है,दिखावा बढा है। आज पत्रकारिता जगत का परिवेष,मूल्य,आदर्श,और वातावरण सभी में अमूलचूक परिवर्तन हुए है। लोगो ने आज पत्रकारिता को अपने निहित स्वार्थो के लिए उपयोग करना शुरू कर दिया है।आज पत्रकारिता एक बडा बाजार है,उस बाजार ने तमाम पत्रकारिता के महारथियों का जमीर खरीद लिया है।वे वही बोलते,लिखते,सोचते व समझते मिलतें है,जो उन्हे बाजार दिखाता है।अध्ययन,स्वाध्याय से दूर ये पत्रकार क्या सोचेगें पत्रकारिता व उसके मानकों के बारे मे?आज अखबारों व चैनलों पर पूजीपतियों का कब्जा है,और वे अपनी पूंजी को बढानें के निहित स्वार्थो को लेकर पत्रकारिता का दुरूपयोग करते है। पत्रकारिता के धौस में ना जाने अपने कितने आर्थिक व अन्य मंसूबों की पूर्ति करते है। लेकिन कुछ और बडे प्रश्न है कि आज के समाचार पत्र व चैनल जो कुछ छाप रहें है या फिर प्रसारित कर रहें है क्या उसे पत्रकारिता कहा जा सकता है? पत्रकारिता से जुडें लोगों की स्थित हालात देखकर,क्षेत्रीय व स्थानीए पत्रकारिता की दुर्दशा देख कर क्या पत्रकारिता के बदले मायनों को क्या नही समझा जा सकता?
अगर ईमानदारी से यर्थाथ का चश्मा लगा कर देखने समझने का प्रयास किया जाए तो सभी कुछ आइने की तरह साफ है।आज की पत्रकारिता कोई समाज को दिशा देने चेताने वाली पत्रकारिता नही है।व्यवसायीकरण के दौर में एक अखबार दूसरे अखबार से, व एक चैनल दूसरे चैनलों से गलाकाट प्रतियोगिता कर रहा है।सर्कुलेशन,टी आर पी व विज्ञापन के लिए वे क्या कुछ नही करते।
सभी पत्रकार कमोबेस इन बातों को जानते समझते है,और सभी इन अखबारों व चैनलों के व्यवसायी मंसूबों को आम सरोकारों को नजर अन्दाज कर पोषित करते है।ज्यादातर समाचार पत्रों मे आधे से ज्यादा अखबार विज्ञप्तियों व विज्ञापनों से भरा मिलता है।व समाचारों की गुणवत्ता में कमी साफ दिखाई देती है। पेड न्यूज,कृपा राशि आदि के आंचल में कैसे और कौन सी न्यूज विश्वसनीए होगी। सोचने का विषय है,आज ना सिर्फ पूंजीपति ही बल्कि राजनेता भी अपने मंसूबों को पत्रकारिता के माध्यम से पोषित करते है।इन आकांछाओं की पूर्ति लिए चैनल मालिक,डेस्क इंचार्ज,संपादकों,रिर्पोटरों आदि को कृपा राशि का भुक्तान किया जाता है। आज की संवेदना विहीन पत्रकारिता से क्या किसी मानकों या मूल्यों की अपेछा की जा सकती है।जब संवेदना के विषयो को चटखारें लगा कर,सनसनी बना कर पेश करना आज के युग की पत्रकारिता है। और उस संवेदना विहीन खबर की जिम्मेदारी बाई लाइन या साइन आफ के लिए ही समाज,देश व पत्रकारिता किसी के मर्यादाओं को ना ध्यान रख कर लिया जाए। तो स्थित आम सरोकारों से दूर होती पत्रकारिता को स्पष्ट कर देती है।

Monday, June 14, 2010

कभी पंकज पचोरी और अलोक सांवल मेरे यूनीवेर्सिटी में आए थे ..................

ये बात उन दिनों की है जब मैं मास्टर ऑफ़ जर्नालिस्म के तीसरे सेमेस्टर में था ... हमारे यहाँ एक सेमीनार में पंकज और अलोक आये थे ...महिला ससक्तिकरण पर सेमीनार में , मैं तो सेमिनार में जाना नहीं चाहता था , लकिन पंकज को ही सुनने के लिए गया था , लेकिन सेमिनार में अलोक का ये कहा ...."जो लोग देखना चाहते है ..हम उन्हें वही देखते है" ये बात उन्होंने तब कही थी जब मेरे एक अनुज दोस्त ने उनसे ये पूछा था कि आप अपने यहाँ जो केंडी ( लडकियो की गन्दी फोटो छापते हो , उससे क्या मैसेज देना चाहते हो ) और पंकज ने हद ही कर दिया था , पंकज ने जिनको मैं अपना आदर्श मानता था , ने इस्टेज से ४५ मिनट तक बोला ....." मैं गुस्से में हू । इसलिए इतना कह रहा हू ...........................फ़िलहाल हम बनिए की नौकरी कर रहे है और अगर हम बिकने लायक खबर नहीं दे सकते तो हम बहर हो जायेंगे ..." माफ़ किजेयेगा पंकज जी मेरी नजर में आप उसी दिन बाहरहो गए थे भले ही आपने पत्रकारिता में कोए भी मुकाम हासिल किया हो ....... मुझे भी उस समय गुस्सा आया था ..और मैं इन सब बातो का जबाब पंकज और अलोक से कहना कहता था ... फिलहाल मैंने अपना विचार लिख कर अपने इंस्टिट्यूट के बोर्ड पर लगा दिया था ...अभी आप सभी के लिए पंकज और अलोक को मेरा जबाब मेरे ब्लॉग के माध्यम से ........................
एक विचारनिये मुद्दा है " महिला ससक्ति करण " । इस दुनिया की आधी आबादी महिलाओ की है । महिला मा होती है बहन होती है पत्नी होती है दोस्त होती है सरे रिश्ते महिलाओ के बिना संभव नहीं है फिर भी आज समाज में महिलाओ की स्थिति बड़ी ख़राब है । आज के समाज में महिलाओ ने ये सिद्ध कर दिया है , वो तमाम सरे कार्य जो पुरुष कर सकते है महिलाये भी कर सकती है और पुरुष से बेहतर कर सकती है , बात मैं पुरुष या नारी की योग्यता की नहीं कर रहा , बात मैं कर रहा हू , महिलाओ के सम्बन्ध में समाज की और मीडिया के लोगो के नजरिये की ........"क्या समाज का चस्मा पहन कर मीडिया के लोग महिलाओ को देखते है ? " जब महिला ससक्तिकरण की बात हो और कुछ मीडिया के जिम्मेदार लोग यह कहते मिले "जो दीखता है वो बिकता है " तो स्थिति और आधिक नाजुक हो जाती है । या फिर मीडिया के कुछ लोग ये कहते मिले "लोग जो देखना चाहते है हम उन्हें वही दिखा रहे है " ऐसे में ये तो स्पस्ट है ऐसे लोग नारी के देह की बात कर रहे होते है ।इनके इस सोच का स्तर इतना निम्न इसलिए होता है क्योकि ये समाज , व्यवस्था , बाजार , व पुरुषवाद के पीछे से इस बात को मंचो से सरे आम कह रहे है और इन्हें अपनी इस विकृत सोच पर जरा भी शर्म नहीं आती है । पुरानी मान्यताये टूटती है नई सामाजिक मान्यताये समाज में बनती भी रही है । ऐसे में मीडिया की नातिक जेम्मेदारी बनती है । की पग पग पर समाज का उचित दिशा निर्देशन करे , ना की अपनी जिम्मेदारियों से पल्ला झाडे । मीडिया आज बाज़ार बाद के हत्थे चढ़ गयी है सच्चाई यही है और इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता लेकिन मीडिया के लोग फिर भी अपना पल्ला समाज से नहीं झाड सकते मीडिया के लोगो को नेतिकता को ध्यान में रख कर समाज का ध्यान रखना है क्यूंकि हमारी भूमिका से समाज प्रभावित होता है एक रोज देश के एक प्रसिद्ध पत्रकार ने मुझसे कहा की "हम बनिए की नौकरी करते है , हम खबर बेचते है अगर बिकने लायक खबर नहीं ला सकते तो बहार कर दिए जायेंगे " मन में बड़ा गुस्सा आया , ये व्यक्ति तो अपनी पत्रकार जिम्मेदारियों से मुह मोड़ रहा है किन्तु बिडम्बना यही है , अधिकांश लोग पत्रकारिता में आज केवल अपनी नौकरी बजा रहे होते है, सही है आज पत्रकार बनिए की नौकरी करते है , पर देश व समाज के प्रति उनकी अहम् जिम्मेदारी होती है जिससे वो इंकार नहीं कर सकते है, ऐसा नहीं की नारी को समाज में स्थान दिलाने के कोई प्रयास नहीं हुए लेकिन ये प्रयास कितने न काफी रहे है , ये समाज में स्पस्ट दृष्टी गोचर है , जब मीडिया के लोग तमाम बहनों के के पीछे अपनी जिम्मे दारी से इंकार कर दे बनिए की नौकरी बता कर खुद बनियों जैसा कार्य करने लगे तो समाज को इन बनियों के हाथो बिकने से कौन रोक पाएगा ? क्या इन लोगो को ये नहीं सोचना चाहिये , इनके इस कृत से समाज कितना प्रभावित होता है परिवार के लोग एक साथ बैठ कर परदे के माध्यम से परोसी जा रही फहुहड़ता को कब तक झेल सकता है बच्चो पर ये क्या प्रभाव डालते है ? लेकिन बनिया तो केवल अपना लाभ देखता है , बनिए का नौकर क्योँ सोचने लगा समाज के बारे में , समाचारपत्रों की या चैनलों की कमाई में विगापनो का अहम् रोल होता है । जिसमे नारी के देह का अनावश्यक प्रयोग अंग प्रदर्सन होता है , पूछे जाने पर ऐसा क्यूं होता है । ऐसा जरूरी है मीडिया के लोगो की रोजी रोटी चलती है , लोग देखना कहते है ........क्या क्या जबाब देते है ऐसे बहनों के पीछे मीडिया के लोग अपना मुह छिपाते है लोग तो बहुत कुछ देकना कहते है बिना उचित अनुचित का हिसाब किये सभी कुछ दिखा देना उचित नहीं होगा , जब बिना उचित अनुचित का ध्यान रख कर चेनल टीआर पी के लिए कुछ भी दिखा देते है .....................................क्या ये सही है .........अभी भी ज्यादा देर नहीं हुई है .... बस अपनी जिम्मेदारियों को उठाने की देर है ............................... अब ये मीडिया के लोगो सोचना है , मीडिया के बनियों के हातू अपने को बेच नौकर बन सिर्फ अपनी नौकरी करनी है ...या फिर .......................सच्ची पत्रकारिता कर दुखी लोगो की कुछ मदत करनी है ............